एम् एस धोनी, भारतीय क्रिकेट टीम के इतिहास का एक ऐसा नाम जो स्वर्णिम अक्षरो में दर्ज हो चूका है। भारतीय क्रिकेट को इतनी ऊंचाइयों पर ले जाने वाले इस कप्तान के ऊपर बनी फिल्म का हर क्रिकेट फैन को इंतज़ार था। मैं भी उन फैन से बिलकुल अलग नहीं था। एम् एस धोनी की उपलब्धियां इस मायने में भी बड़ी हो जाती है कि वह सचिन तेंदुलकर या विराट कोहली के तरह बड़े शहर से नहीं है, न ही वह युवराज सिंह या फिर किसी अन्य क्रिकेटर की तरह क्रिकेट के बैकग्राउंड से है। इस लिहाज से भी एम् एस एक प्रेरणाश्रोत व्यक्ति लगते है।

फिल्म की शुरुआत बिहार के रांची शहर से होती है, धोनी का खेल कूद में अधिक मन लगता है और वे बड़ी गेंद यानी फुटबॉल खेलने के शौक़ीन है। पर उनके भाग्य में क्रिकेट लिखा हुआ था। ठीक जिस तरह कपिल देव का क्रिकेट में पर्दापण हुआ था वैसे ही भाग्य की देन थी कि विकेट कीपर न होने के कारण, उन्हें अपनी स्कूल टीम से खेलने का मौका मिल गया और यहीं से शुरू हुआ धोनी का स्वर्णिम सफर। वहीँ धोनी के पिता पान सिंह धोनी एक पंप ऑपरेटर होते है। भारत के हर पिता की तरह उनकी भी यही चाहत थी कि उनका बच्चा पढ़ लिख कर सरकारी नौकरी करने लगे। आखिर सरकारी नौकरी मिलती भी तो मुश्किल से है। वह ठीक हर माँ बाप की तरह धोनी के माँ बाप भी बच्चो को यही शिक्षा देते है। पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब। बस पहला हाफ इसी कसमकस में बीतता है। जिस तरह अधिकतर भारतीय बच्चो को अपने शौक और पारिवारिक उम्मीदों के बीच लड़ना पड़ता है। ठीक उसी तरह धोनी अपने करियर में लड़ते जूझते, गिरते उठते, ऊपर नीचे होते हुए आगे बढ़ते तो रहे पर धीरे धीरे उन्हें अपनी नौकरी और क्रिकेट में सामंजस्य बिठाना मुश्किल हो रहा था। पहला हाफ उन लोगो के लिए थोड़ा प्रेरणा दायक हो सकता है, जो इसी असमंजस में फंसे हुए है और ज़िन्दगी में कुछ कठिन निर्णय लेने से डर रहे है।

दूसरे हाफ में धोनी इंडियन टीम में सेलेक्ट हो जाते है पर पहले चार मैचों में उनका स्कोर 0, 12, 7 और 3 रहता है। उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे उन्हें टीम से निकाल दिया जाएगा पर फ्लाइट से जाते समय उन्हें बगल की सीट में मिलती है दिशा पाटनी जिन्होंने प्रियंका का किरदार निभाया है। वे उनके लिए लकी चार्म साबित होती है। ठीक उसी तरह जैसे कहावत है एक सफल व्यक्ति के पीछे एक औरत का हाथ होता है। इस फिल्म में धोनी के करियर के साथ प्रियंका का रोल बहुत ही महत्वपूर्ण रोल है। यह रोल इस फिल्म की जान कहे तो कम न होगा। प्रियंका का एक्सीडेंट में ख़तम हो जाना कहानी में इमोशनल टच दे जाता है। शायद प्रियंका न होती तो फिल्म अधूरी अधूरी सी लगती। बाकी धोनी ने जो किया और शाक्षी भाभी के बारे आप सभी दुनिया ने देखा ही है। चाहे वह 2007 का टी-20 विश्व कप हो या फिर 2011 का वनडे विश्व कप।

फिल्म में नीरज पांडेय का डायरेक्शन कमाल का है। उन्होंने धोनी की पर्सनल लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ का बढ़िया सामंजस्य बिठाकर दिखाया है। फिल्म में एक बेसब्रिया गाना भी अच्छा है , जैसी ये फिल्म है ठीक उसी तरह दो एक प्रेरणादायी गाने भी रखे गए है, जो जज्बा पैदा कर दे। जिस तरह हम सभी को पता है कि धोनी और युवराज भारतीय क्रिकेट के बेहतरीन समय के दो साथी है। नीरज पांडेय ने हर मौके पर युवराज को धोनी के बेहतरीन साथी के रूप में दिखाया है। फिल्म का अंत सन 2011 के वर्ल्ड कप फाइनल से करना ही शायद सबसे उचित समय था और नीरज पांडेय ने ठीक वही किया।

जहाँ तक एक्टिंग का सवाल है, सुशांत सिंह राजपूत ने काफी मेहनत की है। उनके लिए यह फिल्म उनकी दिशा और रफ़्तार दोनों बदल देगी। उनकी मेहनत हर तरह से रंग लायी है। चाहे धोनी के रूप में उनका प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘अपार्ट फ्रॉम दैट’ बोलना हो या फिर हेलीकॉप्टर शॉट। हर तरह से वे धोनी को जीते हुए नजर आये है। वहीँ अनुपम खेर ने एक पिता के रूप में अच्छी एक्टिंग की है पर बिहार की भाषा बोलने में थोड़ा चूक गए। वहीँ दिशा पाटनी और कियारा आडवाणी ने भी अपनी एक्टिंग अच्छे से निभायी है।

खासकर मैं जहाँ तक अपनी बात करूँ, मेरा फिल्म देखने जाने का यह भी कारण था कि मैदान और प्रेस कॉन्फ्रेंस में कूल दिखने वाले धोनी आखिर कठिन समय में सोचते कैसे है? या फिर पवैलियन के अंदर चलता क्या है? उनकीं प्रतिक्रिया क्या होती है। इस मामले में फिल्म थोड़ा चूक जाती है। जब धोनी ने पहला शतक लगाया तब मन करता है कि होटल आकर उसे सीनियर खिलाड़ियों जैसे सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली या फिर राहुल द्रविड़ की क्या प्रतिक्रिया दी, मन यह देखना चाहता है पर निराशा हाथ लगती है। वहीँ दूसरी तरफ धोनी की प्रेमिका एक्सीडेंट में मृत्यु हो जाती है और यह पता नहीं चलता कि धोनी जिसकी ज़िन्दगी में एक लड़की जो इतना मायने रखती है, उसके जाने के बाद कैसे चलती है? धोनी कैसे इन सब से बाहर आता है। यह सवाल हर दर्शक को अनुत्तरित छोड़ जाता है। जब विश्व कप फाइनल में रन उसने बनाये सबने देखा, इसे देखने से ज्यादा इस बात पर निगाहें थी कि अपने को ऊपर प्रमोट करने से पहले उसके मनो मस्तिष्क में चल क्या रहा है ? ये सब प्रश्न ऐसे अनुत्तरित छोड़ जाते है कि कभी हम धोनी को खुद से जोड़ नहीं पाते और ऐसा लगता है टीवी पर न्यूज़ चैनल में धोनी की ज़िन्दगी की बाते सुन रहे हो। उसका कप्तान बनते हुए न दिखाना और उसके बड़े भाई को फिल्म में एक बार भी न दिखाना। कुछ अधूरा अधूरा सा लगता है।

आप सुशांत सिंह राजपूत की धोनी के रूप में एक्टिंग या फिर नीरज पांडेय का सधा हुआ निर्देशन के लिए फिल्म देख सकते है। अंत में अगर आप क्रिकेट फैन है या फिर आप जीवन में कुछ करना चाहते है या फिर थोड़ा बहुत इमोशनल ड्रामा पसंद करते है और धोनी की प्रेमिकाओ के बारे में जानना चाहते है, तो एक बार फिल्म जरूर देखनी चाहिए।